Thursday, February 22, 2024

जगजीत सिंह : ग़ज़ल सम्राट – चिट्ठी न कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश, जहाँ तुम चले गए। (जीवन स्कैन)

जगजीत सिंह : ग़ज़ल सम्राट (Jagjit Singh)

जगजीत सिंह (Jagjit Singh) जो ‘ग़ज़ल सम्राट’, ‘ग़ज़ल के बादशाह’ जैसे नामों से नवाजे जाते हैं। गज़़ल के क्षेत्र में उनका जो स्थान है, वैसा स्थान भारत में कोई नहीं बना पाया। जो ग़ज़ल विधा को एक नई ऊँचाइयाँ दी है, उनके याद करते हैं…

जगजीत सिंह जो अपनी मखमली आवाज के जादू में सबको मदमस्त करते थे, वह 10 अक्टूबर 2011 को इस दुनिया से चले गए। उनकी यादें आज भी सब गजल प्रेमियों के दिल में बसी हुई हैं।

जगजीत सिंह भारत के एक महान ग़ज़ल कार थे। उन्होंने ग़ज़ल को जिस ऊँचाई तक पहुंचाया उस कारण उन्हें ग़ज़ल सम्राट ग़ज़ल के बादशाह आदि उपाधियों से विभूषित किया जाता था। उनके जैसा ग़ज़ल कार भारत में इससे पहले कोई नहीं हुआ और आगे भविष्य में ना कोई होगा यह बात भी तय है।

ग़ज़ल को आधुनिक और लोकप्रिय रूप देने का श्रेय अगर भारत में किसी को जाता है तो वह उसका नाम जगजीत सिंह है। जगजीत सिंह से पहले ग़ज़ल केवल एक खास वर्ग तक ही सीमित थी, लेकिन जगजीत सिंह ने ग़ज़ल में अनोखे प्रयोग करके और अपनी मखमली आवाज के जादू से ग़ज़ल को हर वर्ग में खासकर युवा वर्ग में बेहद लोकप्रिय बनाया।

जन्म

जगजीत सिंह का जन्म 8 फरवरी 1941 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में एक सिख परिवार में हुआ था। जगजीत सिंह के पिता का नाम अमर सिंह धमानी था। वे राजस्थान के गंगानगर में एक सरकारी कर्मचारी थे। मूलतः वेे पंजाब के रोपड़ जिले के रहने वाले थे।

जगजीत सिंह के पिता ने सिख धर्म अपनी स्वेच्छा से स्वीकार किया था, उससे पहले वह हिंदू धर्म से संबंध रखते थे। जगजीत सिंह के बचपन का नाम ‘जीत’ था।

उनकी आरंभिक शिक्षा श्रीगंगानगर के खालसा विद्यालय में हुई थी और उसके बाद उन्होंने जालंधर की ओर रुख किया और वहाँ से डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। उसके बाद कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की। जगजीत सिंह के पिता भी संगीत में रुचि रखते थे। इसीलिए संगीत उन्हें विरासत में मिला था। श्रीगंगानगर में ही उन्होंने पंडित छगनलाल शर्मा से लगभग 2 साल तक शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली और संगीत के क्षेत्र में अपने कदम रख दिये।

हालाँकि उनके पिता उन्हे आईएएस बनाना चाहते थे, लेकिन जगजीत सिंह के मन में तो संगीत के बीज पढ़ चुके थे और उन पर गायक बनने की धुन सवार हो गई थी। वह श्रीगंगानगर में ही कार्यक्रमों छोटा-मोटा गायन करने लगे और अपनी पढ़ाई के दौरान भी उन्होंने अपनी गायन प्रतिभा को निरंतर निखारा और अनेक छोटी-मोटी प्रस्तुतियां दी।

गायन के प्रति उनकी रुचि देखकर उनके मित्रों और शुभचिंतकों की सलाह पर वह 1965 में मुंबई आ गए। मुंबई में आरंभिक दिनों में उन्होंने काफी संघर्ष किया। उन्होंने विज्ञापनों के लिए जिंगल कर उन्होंने अपने संघर्ष का समय काटा। यह उनके संघर्ष का दौर था।

धीरे-धीरे वह मुंबई में उन्हें काम मिलने लगा, लेकिन जैसा काम वे चाहते थे और जिस तरह की आशाएं पालकर में मुंबई आए थे, वैसा अभी तक कुछ हुआ नहीं था। उन्होंने कई फिल्मों में संगीत भी दिया लेकिन उस समय उनके द्वारा दी गई संगीत दी गई फिल्में खास चली गई और उनका संगीत औसत दर्जे का ही रहा। उन्हें सही सफलता फिल्म साथ-साथ में उनके द्वारा दिये गये संगीत और गानों से मिली उसके बाद प्रेमगीत फिल्म का उनका गीत ‘होठ से छू लो तुम’ गीत काफी लोकप्रिय हुआ। फिल्म ‘अर्थ’ में उनके द्वारा गायी सभी ग़ज़लें बेहद लोकप्रिय हुईं। इस फिल्म में संगीत भी उन्होने ही दिया। फिल्मों गाने या ग़ज़लों के मामले में उन्हें बहुत अधिक विशेषता नही मिली थी। कुछ फिल्में उनके द्वारा गायी ग़ज़लें/गाने बेहद लोकप्रिया हुईं।

फिल्मों में उनके द्वारा गाये कुछ गीत और ग़ज़ल बेहद लोकप्रिय हुए जोकि इस प्रकार हैं…

  • साथ-साथ ➩ तुमको देखा तो ये ख़्याल आया, जिंदगी धूप तुम घना साया
  • साथ-साथ ➩ प्यार मुझसे किया तुमने तो क्या पाओगी
  • साथ-सात ➩ ये तेरा घर ये मेरा घर
  • अर्थ ➩ झुकी-झुकी सी नज़र बेकरार है कि नही
  • अर्थ ➩ तुम जो इतना मुस्कुरा रहे हो
  • अर्थ ➩ तेरी खुश्बू में बसे खत
  • प्रेमगीत ➩ होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो
  • दुश्मन ➩ चिट्ठी ना कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहाँ तुम चले गये,
  • जॉगर्स पार्क ➩ बड़ी नाजुक है यह मंजिल, मोहब्बत का सफर है
  • सरफरोश ➩ होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है
  • ट्रैफिक सिग्नल ➩ हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते
  • तुम बिन ➩ कोई फरियाद तेरे दिल में दबी हो
  • तरकीब ➩ किसका चेहरा अब मैं देखूं, तेरा चेहरा देखकर
  • नरगिस ➩ मैं कैसे कहूँ जानेमन, तेरा दिल सुने मेरी बात

ग़जलों का सफर

मुंबई में छोटे-मोटे कार्यक्रमों में गजलें गाने के दौरान और संगीत सीखने की प्रक्रिया के दौरान उनकी मुलाकात 1967 में चित्रा सिंह से हुई, जो खुद गायन करती थीं और शादीशुदा थीं।

2 साल तक दोनों का प्रेम प्रसंग चला। चित्रा सिंह की पहली शादी एक असफल शादी थी, इसीलिए उनका उनके पति से तलाक हो गया और 1969 में जगजीत सिंह ने चित्रा सिंह से विवाह कर लिया।

ग़ज़लों के क्षेत्र में दोनों को सबसे पहली से सफलता तब मिली जब 1975 में एचएमवी कंपनी ने जगजीत सिंह और चित्रा का पहला एल्बम ‘द अनफॉरगेटेबल’ निकाला।

उसके बाद जगजीत सिंह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और दोनों ग़ज़ल युगल के अनेक एल्बम आए। दोनों पति पत्नी साथ गाते रहे और लोकप्रियता के शिखर पर चढ़ते चले गए।

1987 में जगजीत सिंह ने डिजिटल सीडी एल्बम ‘बियोंड टाइम्स’ निकाला जो किसी भारतीय संगीतकार द्वारा निकाला गया पहाल सीडी एल्बम था।

1991 में जगजीत सिंह के पुत्र विवेक सिंह की मृत्यु के बाद चित्रा सिंह ने गायन छोड़ दिया। जगजीत सिंह भी कई महीनों तक सदमे में रहे और कुछ महीनों के बाद दुख से उबलने के बाद उन्होने दोबारा गायन शुरु किया लेकिन चित्रा सिंह फिर कभी नही गा पाईं।

फिल्मों में अर्थ और साथ-साथ फिल्मों में उन्होंने लगभग सभी गाने गाए थे और सभी गाने नगर बेहद लोकप्रिय हुए थे। जगजीत सिंह की प्रमुख एल्बम के नाम इस प्रकार हैं

  • द अनफॉरगेटेबल (The Unforgettable) 1975
  • एटर्निटी (Eternity) 1978
  • ए माइलस्टोन (A Milestone) 1980
  • मैं और मेरी तन्हाई (Mai Aur Meri Tanhai) 1981
  • दे लेटेस्ट (The Latest) 1982
  • द गोल्ड डिस्क (The God Disk)1983
  • ए मेरे दिल (Ye Mere Dil)1983
  • एस्कटेसिस (Ecstasies) 1984
  • ए साउंड अफेयर (A Sound Affair) 1985
  • इकोस (Echoes) 1986
  • समवन समव्हेयर (Someone Somewhere) 1986
  • पैशन (Passion) 1987
  • बियोंड टाइम्स (Beyond Times)1987
  • द अनफॉरगेटेबल हिट्स (The Unforgettable Hits) 1987
  • मिर्जा गालिब (Mirza Ghalib)1988 (टीवी सीरियल)
  • डिज़ायर्स (Desires) 1989
  • इमोशंस (Emotions) 1989
  • महफिल (Mehfil) 1990
  • मेमोरेबल ग़ज़ल (Memorable Ghazals) 1990
  • सज़दा (Sazda) 1991
  • होप (Hope) 1991
  • कहकशां (Kahakashan)1991 (टीवी सीरियल)
  • इन सर्च (In Search)1992
  • विजन (Vision) 1992
  • अदा (Adaa)1992
  • रेअर गेम्स (Rare Games) 1992
  • योर चॉइस 1993
  • चिराग 1993
  • इनसाइट 1994
  • यूनिक 1996
  • क्राइ फॉर क्राइ 1995
  • फेस टू फेस 1996
  • मिरेज 1996
  • सिलसिले 1998
  • रिश्तो में दरार आई 1996
  • लव इस ब्लाइंड 1998
  • जाम उठा 1998
  • मरासिम 1999
  • नई दिशा 1999
  • रेअर मूमेंट्स 1999
  • रॉयल सेल्यूट 1999
  • सहर 2000
  • एक जर्नी 2000
  • क्लासिक फॉरएवर 2000
  • टुगेदर 2000
  • आइना 2000
  • डिफरेंट स्ट्रोक्स 2001
  • सॉलि़ड गोल्ड 2001
  • सोज़ 2001
  • खामोशी 2008
  • खुमार 2001
  • ख्वाहिश 2001
  • संवेदना 2002
  • फॉरएवर 2002
  • फॉरगेट मी नोट 2002
  • माय फेवरेट 2002
  • क्लोज टू माई हार्ट 2002
  • मुंतज़िर 2004
  • प्रे फॉर इंडिया 2004
  • तुम तो नहीं हो 2005
  • जीवन क्या है 2005
  • कोई बात चले 2006
  • स्टोलेन मोमेंट्स 2006
  • आवाज 2006
  • कबीर 2006
  • जज्बात 2008
  • इंतेहा 2009
  • रवायत 2009
  • दर्दे जिगर 2011
  • द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ़ जगजीत सिंह 2011
  • शुकराना 2011
  • निवेदन 2011
  • रोमांस 2011 तेरे बयां ग़ालिब 2012
  • द वॉइस फ्रॉम बियोंड 2013

जगजीत सिंह – रोमानियत का अहसास

जगजीत सिंह ग़ज़ल की दुनिया में अनोखे ग़ज़लकार थे। उन्होंने गजलों में अनेक प्रयोग किए। उन्होंने ही गजलों में पारंपरिक वाद्य यंत्रों के अलावा आधुनिक वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया और ग़ज़लों को एक नया रूप दिया। उनके इस प्रयोग से गजल आधुनिक पीढ़ी की युवा में भी लोकप्रिय हुई नहीं तो उससे पहले गजल यह बोरिंग विधा बन चुकी थी।

जगजीत सिंह की भारी और मखमली आवाज लोगों के दिल के तारों को छेड़ दी थी थी। उनकी आवाज और उनके द्वारा गाई हुई ग़ज़लों से एक रूमानियत का एहसास होता था। हम जब भी जगजीत सिंह की गजलें सुनते तो रोमानियत की अनोखी दुनिया में पहुँच जाते थे।

जगजीत सिंह की ग़ज़लों मैं एक नई आशा, एक नई रोमानियत और आध्यात्मिकता दी। उनकी गजलों का जवाब नहीं था। व्यक्तिगत तौर पर कहूँ तो जगजीत सिंह की गजलों को सुनकर एक अलग अलग ही पवित्रता और आध्यात्मिकता का बोध होता था, वो आध्यात्मिकता थी प्रेम की आध्यमिकता।

जहाँ पर प्रेम की पवित्रता के अलावा कुछ नही होता। उनकी ग़जलों को सुनकर मन की सारी वासनायें भस्म हो जाती थीं और मन पवित्र प्रेम की आध्यात्मिकता से भर उठता था, ये व्यक्तिगत अनुभव है। आज भी उनकी ग़ज़ले जीवन की निराशा को दूर करती है।

जगजीत सिंह का जाना

जगजीत सिंह 2011 में सितंबर-अक्टूबर के महीनों के दौरान काफी से समय से ब्रेन स्ट्रोक के कारण अस्पताल में भर्ती थे। 10 अक्टूबर 2011 को जगजीत सिंह को ब्रेन स्ट्रोक की तकलीफ के कारण होने के कारण वह हम सब को छोड़कर इस दुनिया से चले गए, लेकिन अपनी गजलों के रूप में वह आज भी सभी लोगों के दिलों में जिंदा हैं।  उनको भावभीनी श्रद्धांजलि।


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