आशय स्पष्ट कीजिए- क. तृष्णा जो लोभ की बेटी है, कभी अपनी भूख नहीं मिटा पाई। ख. प्रसिद्धि की बला एक कला ही है पर लोभ उस बला में फँसकर बेहद सुख मानता है।

निम्नलिखित पंक्तियों का आशय इस प्रकार है…

क. तृष्णा जो लोभ की बेटी है, कभी अपनी भूख नहीं मिटा पाई।

इस पंक्ति का आशय यह है कि तृष्णा यानी इच्छा लोभ यानी लालच की बेटी होती है। मनुष्य के अंदर इच्छाएं तभी जन्म लेती है, जब उसके अंदर लोभ की प्रवृत्ति होती है। जो मनुष्य जितना अधिक लोभी होगा उसके अंदर उतनी ही अधिक इच्छाएं होंगी। जब तक मनुष्य के अंदर लोभ की प्रवृत्ति बनी रहेगी, उसकी इच्छाएं कभी खत्म नहीं होने वाली। इसलिए मनुष्य को आवश्यक है कि वे अपने लोभ की प्रवृत्ति को अंकुश लगाए। लोभ यानि लालच आदत को हमेशा के लिए समाप्त करें और संतोष का भाव अपनाएं। तब मनुष्य के अंदर से तृष्णा यानी इच्छाएं अपने आप ही सीमित हो जाएंगी और वह सुखी जीवन जी पाएगा, क्योंकि असीमित इच्छा ही दुख का कारण होती हैं।

ख. प्रसिद्धि की बला एक कला ही है पर लोभ उस बला में फँसकर बेहद सुख मानता है।
इस पंक्ति का आशय यह है कि प्रसिद्धि यानी यश पाने की इच्छा सभी के अंदर होती है। लेकिन जब प्रसिद्धि पाने की इच्छा आदत बन जाती है, तो कष्टदायक हो जाती है। अधिक से अधिक प्रसिद्धि पाने की आकांक्षा में मनुष्य कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाता है और जितना ज्यादा यश उसे मिलता है, वह स्वयं को उतना ही अधिक सुखी समझता है, लेकिन वह यह नहीं जानता कि वह प्रसिद्धि पाने के जाल में उलझ कर रह गया है। जिस दिन प्रसिद्धि खत्म होगी, वह स्वयं को अकेला पाएगा। इसलिए बहुत अधिक प्रसिद्धि पाने की भूख नहीं होनी चाहिए।

 

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