लेखिका महादेवी वर्मा के बचपन के समय लड़कियों के प्रति समाज की सोच कैसी थी? ‘मेरे बचपन के दिन पाठ’ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

लेखिका महादेवी वर्मा के बचपन के समय लड़कियों के प्रति समाज की सोच बिल्कुल भी अच्छी नहीं थी। लेखिका महादेवी वर्मा के बचपन के समय समाज के लोग लड़कियों को बोझ के समान समझते थे और जब लड़कियों का जन्म होता तो या तो उन्हें जन्म लेते ही मार दिया जाता था अथवा उनकी भ्रूण हत्या कर दी जाती थी। यदि लड़कियां जीवित रह जाती तो भी उन्हें बोझ समझ कर या पराया धन समझ कर ही पाला जाता था।

घर जो भी सुख-सुविधाएं होती थीं वह सब लड़कों को ही प्राप्त थीं। लड़कियों को कम भोजन देना, उनसे घरेलू कार्य करवाना, उन्हें पढ़ाई लिखाई के लिए विद्यालय ना भेजना आदि सामाजिक बुराइयां आम थीं।
लेखिका के अनुसार जब किसी घर में किसी संतान का जन्म हो रहा होता था तो बैंड बाजे वाले, नौकर चाकर आदि सभी लड़का होने की आस लगाए रहते थे और यदि उन्हें पता चलता था कि लड़की हुई है तो सब उदास होकर चुपचाप चले जाते थे।

‘मेरे बचपन के दिन’ पाठ में लेखिका महादेवी वर्मा ने अपने बचपन के दिनों के संस्मरण बताए हैं। उन्होंने अपनी बचपन की स्मृतियों ने बताया है कि कैसे जब उनका जन्म हुआ तो उन्हें वह सब नहीं सहना पड़ा जो उस समय उनके समाज में लड़कियों को सहना पड़ता था। क्योंकि उनके घर में 100 साल बाद किसी लड़की का जन्म हुआ था। हालांकि उनके जन्म के समय समय भारतीय समाज में लड़कियों के प्रति अच्छी भावना नहीं होती थी।

 

हमारे अन्य प्रश्न

‘नीलकंठ’ कहानी के द्वारा लेखिका क्या संदेश देना चाहती हैं? 60-80 शब्द लिखिए।

भाव स्पष्ट कीजिए- दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित, तेरे जीवन का अणु गल गल!

कवयित्री को आकाश के तारे स्नेहहीन से क्यों प्रतीत हो रहे हैं?

कवयित्री किसका पथ आलोकित करना चाह रही हैं?

 

हमारी सहयोगी वेबसाइटें..

Our Multi-Topic Website
miniwebsansar.com
गुणों से भरपूर है लहसुन, एक नही है अनेकों है गुण
वजन बढ़ाने के उपाय, जरूर आजमायें
अंकुरित अनाज (Sprouts) के फायदे

Leave a Comment