क्या कवि की यह प्रार्थना आपको अन्य प्रार्थना गीतों से अलग लगती है? यदि हाँ, तो कैसे?

कवि की यह प्रार्थना हमें अन्य प्रार्थना से अलग लगती है, क्योंकि अन्य प्रार्थना में लोग स्वयं के लिए धन-वैभव, सुख-संपत्ति, संतान, समृद्धि, भौतिक वस्तुएं आदि यह सभी मांगते हैं। वह अपने जीवन को सुख वैभव सुख से परिपूर्ण करने के लिए ही प्रार्थना करते हैं। जबकि इस प्रार्थना में कवि ऐसा कुछ नहीं मांग रहा। वह ईश्वर से सीधे तौर पर धन-वैभव, संपत्ति, सुख आदि की कामना नहीं कर रहा। कवि इस प्रार्थना के माध्यम से स्वयं के लिए संघर्ष करने की शक्ति मांग रहा है, आत्मबल मांग रहा है, वह आत्मविश्वास मांग रहा है और इस प्रार्थना में वह केवल स्वयं के लिए ही नही बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए ही इन गुणों की मांग रहा है।

कवि इस प्रार्थना के माध्यम से ईश्वर से सीधे तौर पर सुख-वैभव नहीं मांग कर अपने लिए जीवन में संघर्ष करने की सामर्थ्य मांग रहा है। इस तरह इस प्रार्थना में कर्महीन न बनकर कर्मशील बनने की प्रार्थना कर रहा है, इसलिए ये प्रार्थना उसे दूसरी प्रार्थनाओं से अलग करती है।

पाठ के बारे में…

इस पाठ में रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित कविता ‘आत्मत्राण’ को प्रस्तुत किया गया है। यह कविता मूल रूप से बांग्ला में लिखी गई थी, जिसका अनुवाद हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी में किया है। इस कविता के माध्यम से कवि गुरु रविंद्र टैगोर मानते हैं कि ईश्वर ने सब कुछ संभव कर देने की सामर्थ होती है, फिर भी ईश्वर नहीं चाहते कि वह वही सब कुछ करें। क्योंकि ईश्वर चाहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में आपदा विपदा, कष्ट से आदि की स्थिति में स्वयं संघर्ष करना सीखें ।

कविता में कवि ने कहा है कि तैरना चाहने वालों को पानी में कोई उतार तो सकता है, लेकिन तैरना सीखने के लिए तैरने वाले को ही स्वयं हाथ पैर चलाने पड़ते हैं। तभी वह तैराक बनाता है। परीक्षा देने जाने वाला छात्र अपने बड़ों से और गुरुजनों से आशीर्वाद लेता है और उसके बड़े उसे सफल होने का आशीर्वाद तो देते हैं, लेकिन आशीर्वाद देने से ही सफल नही हुआ जा सकता है, उसे स्वयं परीक्षा देनी होगी, तभी आशीर्वाद फलीभूत होगा।

कविता में कवि के कहने का मूलभाव यही है कि मनुष्य को जीवन में स्वयं संघर्ष करना सीखना चाहिए तो ईश्वर उसके संघर्ष को आसान बना सकते हैं। हाथ-पर हाथ रखरकर बैठने वाले की ईश्वर सहायता नहीं करतेष ईश्वर केवल कर्मशील मनुष्य की सहायता करते हैं।रवींद्रनाथ ठाकुर बंगाली भाषा के महान कवि एवं लेखक रहे हैं। उनका जन्म 6 मई 1818 को कोलकाता के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। वह साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले भारतीय भी हैं। उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार उनकी काव्य कृति ‘गीतांजलि’ के लिए मिला था।

उनके उनके द्वारा रची गई अन्य काव्य कृतियों के नाम इस प्रकार हैं, पूरबी, काबुलीवाला,  नैवेद्य, बलाका, क्षणिका, चित्र और सांध्यगीत। इनके अलावा उन्होंने अनेकों कहानियां लिखी थीं। उनका निधन 1941 में हुआ था।

संदर्भ पाठ :

“आत्मत्राण” कविता, रवींद्रनाथ ठाकुर (कक्षा – 10, पाठ – 9, हिंदी, स्पर्श भाग-2)

 

इस पाठ के अन्य प्रश्न

अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए आप प्रार्थना के अतिरिक्त और क्या-क्या प्रयास करते हैं? लिखिए।

‘आत्मत्राण’ शीर्षक की सार्थकता कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

 

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