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कवि ‘नयन न तिरपित भेल’ के माध्यम से विरहिणी नायिका की किस मनोदशा को व्यक्त करना चाहता है?
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कक्षा-12 पाठ-9 हिंदी, कक्षा-12 पाठ-9 हिंदी अतंरा, विद्यापति, विद्यापति के पद

‘नयन न तिरपित भेल’  इस पंक्ति के माध्यम से कवि विरहिणी नायिका की उस मनोदशा को व्यक्त करना चाहता है, जिस मनोदशा में नायिका अपने प्रियतम के सुंदर मनोहारी रूप के प्रति आसक्त है। वह अपने प्रियतम के सुंदर मनोहारी रूप को निरंतर निहारते रहना चाहती है।
नायिका अपने प्रियतम के रूप को जितना भी अधिक निहारती है, उसे तृप्ति नहीं मिलती। वह चाहती है कि वह हर पल अपने प्रियतम को देखती रहे। नायिका के प्रियतम का रूप परिवर्तित है वह हर पल बदलता रहता है। इसी कारण नायिका हर बार उसकी ओर और अधिक आकर्षित होती जाती है। नायिका के प्रियतम का रूप इतना मनोहारी है कि नायिका बार-बार देखने पर भी उसके सुंदर सलोने रूप से तृप्त नहीं हो पाती। उसके प्रियतम का सुंदर सलोना रूप पल-पल बदलकर नायिका की आकांक्षा को और बनाता रहता है और नायिका की तृप्ति का भाव मिट नहीं पाता। वह अपने प्रियतम के सुंदर रूप के मोहपाश बंधी हुई उसे हर पल देखते रहना चाहती है।

पाठ के बारे में…

इस पाठ में कवि विद्यापति के 3 पद प्रस्तुत किए गए हैं।
पहले पद में नायिका जोकि विरहिणी के रूप में है, उसके हृदय के उद्गारों को प्रकट किया गया है। दूसरे पद में प्रियतमा रूपी नायिका अपनी सखी से अपने प्रियतम के विषय में बातचीत कर रही है। तीसरे पद में विरहिणी रूपी प्रियतमा यानी नायिका का दुख भरा चित्रण प्रस्तुत किया गया है जो अपने प्रियतम के वियोग में तड़प रही है।
विद्यापति हिंदी साहित्य के चौदहवीं एवं पंद्रहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध कवि रहे हैं। वह आदिकाल और भक्तिकाल के संधि कवि कहे जाते हैं। उनका जन्म बिहार के मधुबनी के बिस्पी गाँव में सन् 1380 ईस्वी में हुआ था। बिहार के मिथिला क्षेत्र के लोक अंचलों में वह बेहद प्रसिद्ध कवि रहे हैं और उनके पदों को बड़ी तन्मयता से गाया जाता रहा है। उनकी महत्वपूर्ण कृतियों में कीर्तिलता, कीर्तिपताका, भू-परिक्रमा, पुरुष समीक्षा, लिखनावली और पदावली के नाम प्रमुख हैं। उनका निधन 1460 ईस्वी में हुआ।

संदर्भ पाठ :

विद्यापति – पद, (कक्षा – 12, पाठ – 9, हिंदी, अंतरा)

 

हमारे अन्य प्रश्न उत्तर :

प्रियतमा के दुख के क्या कारण हैं?

नायिका के प्राण तृप्त न हो पाने के कारण अपने शब्दों में लिखिए।

 

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