लघु सुरधनु से पंख पसारे-शीतल मलय समीर सहारे ।उड़ते खग जिस ओर मुँह किए- समझ नीड़ निज प्यारा।बरसाती आँखों के बादल-बनते जहाँ भरे करुणा जल।लहरें टकराती अनंत की- पाकर जहाँ किनारा। हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती ढुलकाती सुख मेरे। मदिर ऊँघते रहते जब-जगकर रजनी भर तारा।


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लघु सुरधनु से पंख पसारे-शीतल मलय समीर सहारे ।

उड़ते खग जिस ओर मुँह किए- समझ नीड़ निज प्यारा।

बरसाती आँखों के बादल-बनते जहाँ भरे करुणा जल।

लहरें टकराती अनंत की- पाकर जहाँ किनारा।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती ढुलकाती सुख मेरे।

मदिर ऊँघते रहते जब-जगकर रजनी भर तारा ।
संदर्भ :
ये पंक्तियां ‘जयशंकर प्रसाद’ द्वारा रचित ‘कार्नोलिया का गीत’ कविता की है। ‘कार्नोलिया का गीत’ कविता जयशंकर प्रसाद की कृति ‘चंद्रगुप्त’ नामक नाटक का एक अंश है। इस गीत के द्वारार भारत की अद्भुत सुबह की सुंदरता का वर्णन किया गया है।
व्याख्या :

कार्नोलिया भारत भूमि की महिमा का बखान करते हुए कहती है कि यह भारत देश जहाँ की प्रातः कालीन सुबह लालिमा से युक्त होती है, यह भारत देश अद्भुत और आनंदमयी है। भारत में विश्व के कोने-कोने से ज्ञानीजन जिज्ञासु बनकर आते रहे हैं और अपनी जिज्ञासा को यहां पर शांत करते रहे हैं।

प्रातकाल की सुबह में वृक्ष की फुनगियों पर सूरज की लालिमा का सौंदर्य ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे किसी ने जीवन रूपी हरियाली पर कुमकुम बिखेर दी हो। चारों तरफ उड़ रहे रंग-बिरंगे पक्षी जो कि बिल्कुल इंद्रधनुष के समान दिखाई पड़ रहे हैं, वे पक्षी जिस तरह बहती हवा के साथ अपने-अपने घोंसलों की ओर जाने के लिए उत्साहित हो रहे हैं, वह अद्भुत दृश्य देखकर आनंद ही आनंद हो उठता है।

भारत देश अनोखा देश है और यहां के निवासी भी अनोखे हैं। वह सब दया एवं परिवार से परिपूर्ण हैं। भारतवासी दूसरों के दुख से द्रवित हो जाने वाले मनुष्य हैं, जिनकी आँखों से दूसरे का दुख देखकर आँसू फूट पड़ते हैं और यह आँसू बादल बनकर करुणा की बारिश करते हैं।

संसार भर की लहरें कहीं अनंत दूर से आकर इस भारतवर्ष को अपना आश्रय स्थल बनाती रहती हैं। भारतवर्ष की शोभा अवर्णनीय है। इसकी सुबह का जितना भी अधिक वर्णन किया जाए वह पूरा नहीं होगा। जितनी भारत की सुबह निराली है उतनी ही भारत की रात भी निराली है। रात भर चमकने वाले तारे जब और सुबह होने के समय मदमस्त होकर ऊँघने लगते हैं तो उषा रूपी सुंदरी सूरज रूपी घड़े को आकाश रूपी तालाब डुबोकर कर प्रकाश रूपी जल लाती हुई प्रतीत होती है।

 

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सुनि सुनि ऊधव की अकह कहानी कान कोऊ थहरानी कोऊ थानहि थिरानी हैं। कहैं ‘रतनाकर’ रिसानी, बररानी कोऊ कोऊ बिलखानी, बिकलानी, बिथकानी हैं। कोऊ सेद-सानी, कोऊ भरि दृग-पानी रहीं कोऊ घूमि-घूमि परीं भूमि मुरझानी हैं। कोऊ स्याम-स्याम कह बहकि बिललानी कोऊ कोमल करेजौ थामि सहमि सुखानी हैं। संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए।

नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत । ते ‘रहीम’ पसु से अधिक, रीझेहु कछू न देत ॥

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