लाए कौन संदेश नए घन! दिशि का चंचल, परिमल-अंचल, छिन्न हार से बिखर पड़े सखि! जुगनू के लघु हीरक के कण! लाए कौन संदेश नए घन! सुख दुख से भर, आया लघु उर, मोती से उजले जलकण से छाए मेरे विस्मित लोचन! लाए कौन संदेश नए घन! भावार्थ बताएं।

लाए कौन संदेश नए घन!
दिशि का चंचल,
परिमल-अंचल,
छिन्न हार से बिखर पड़े सखि!
जुगनू के लघु हीरक के कण!

लाए कौन संदेश नए घन!
सुख दुख से भर,
आया लघु उर,
मोती से उजले जलकण से
छाए मेरे विस्मित लोचन!
लाए कौन संदेश नए घन!

संदर्भ : महादेवी वर्मा द्वारा रचित कविता लाए कौन संदेश नए गण इन पंक्तियों का भावार्थ इस प्रकार है

भावार्थ : कवयित्री कहती हैं कि आकाश में चारों तरफ उमड़ रहे बादल ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, जैसे मैं किसी का संदेश लेकर आ रहे हों। यह बादल चारों तरफ हर दिशा में घूमते रहते हैं। इसी कारण इन्हें चंचल भी कहा जाता है। यह बादल एक जगह पर टिक नहीं रहते और आकाश में चारों तरफ इस तरह छाए रहते हैं, जैसे मानो इन्हें किसी ने मल दिया हो। इसी कारण इन्हें परिमल भी कहा जाता है।

कवयित्री कहती है कि जिस तरह हार के टूटने पर उसके मोती चारों तरफ बिखर जाते हैं। उसी तरह आकाश में यह बादल छोटे-छोटे टुकड़ों में चारों तरफ उसी तरह बिखर जाते हैं। ऐसे लगता है कि आकाश में चारों तरफ हीरे-मोती बिखरे पड़े हो यानी कि रात के समय जिस तरह जुगनू धरती पर जगमगाते हैं और हीरे के समान दिखाई देते हैं, उसी तरह आकाश में यह बादल भी हीरे के समान दिखाई पड़ रहे हैं।

यह बादल अपने छोटे से दिल में सुख-दुख का संदेश लेकर आए हैं। जब यह वर्षा करते हैं तो वर्षा की बूंदे मोती के समान व्यक्ति हैं और ऐसा लगता है कि इन बादलों से मोती बरस रहे हों। कवयित्री बादलों को देखकर आश्चर्यचकित हैं। वह मन में सोच रही हैं कि यह घने बादल अब कौन सा संदेश लेकर आए हैं।

 


निज गौरव से कवि का क्या अभिप्राय है?

चुप रहने के, यारों बड़े फायदे हैं, जुबाँ वक्त पर खोलना सीख लीजे । भावार्थ ?

“थाल मे लाऊँ सजाकर भाल जब भी” पंक्ति मे निहित भाव को स्पष्ट कीजिए।​

बस्स! बहुत हो चुका कविता का भावार्थ।

Leave a Comment