पद : विद्यापति (कक्षा-12 पाठ-9 हिंदी अंतरा भाग 2)

NCERT Solutions (हल प्रश्नोत्तर)

पद : विद्यापति (कक्षा – 12, पाठ – 9, अंतरा भाग – 2)

PAD : Vidyapati (Class-12 Chapter-9, Hindi Antra 2)


पाठ के बारे में…

इस पाठ में कवि विद्यापति के 3 पद प्रस्तुत किए गए हैं।

पहले पद में नायिका जोकि विरहिणी के रूप में है, उसके हृदय के उद्गारों को प्रकट किया गया है। दूसरे पद में प्रियतमा रूपी नायिका अपनी सखी से अपने प्रियतम के विषय में बातचीत कर रही है। तीसरे पद में विरहिणी रूपी प्रियतमा यानी नायिका का दुख भरा चित्रण प्रस्तुत किया गया है जो अपने प्रियतम के वियोग में तड़प रही है।

कवि के बारे में…

विद्यापति हिंदी साहित्य के चौदहवीं एवं पंद्रहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध कवि रहे हैं। वह आदिकाल और भक्तिकाल के संधि कवि कहे जाते हैं। उनका जन्म बिहार के मधुबनी के बिस्पी गाँव में सन् 1380 ईस्वी में हुआ था। बिहार के मिथिला क्षेत्र के लोक अंचलों में वह बेहद प्रसिद्ध कवि रहे हैं और उनके पदों को बड़ी तन्मयता से गाया जाता रहा है। उनकी महत्वपूर्ण कृतियों में कीर्तिलता, कीर्तिपताका, भू-परिक्रमा, पुरुष समीक्षा, लिखनावली और पदावली के नाम प्रमुख हैं।

उनका निधन 1460 ईस्वी में हुआ।


पद : विद्यापति


पाठ के हल प्रश्नोत्तर…

प्रश्न 1

प्रियतमा के दुख के क्या कारण हैं?

उत्तर :

विद्यापति के पद में वर्णित प्रियतमा के दुख के निम्नलिखित कारण हैं…

  • प्रियतमा का प्रियतम यानी उसका पति किसी कार्य के लिए परदेश गया हुआ है। प्रियतमा अपने पति से मिलन को पीड़ित है, लेकिन पति की अनुपस्थिति के कारण उसे बेहद पीड़ा हो रही है।
  • प्रियतमा अपने घर में अकेली है और पति की अनुपस्थिति में अकेला घर उसे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा।
  • सावन का मास शुरु हो गया है। सावन के महीने में प्रियतमा के मन में प्रियतम से मिलन का भाव उत्पन्न हो रहा है और वर्षा का आगमन भी उसे उद्वेलित कर गहन दुख दे रहा है, क्योंकि उसका प्रियतम उसके पास नहीं है।
  • प्रियतमा का प्रियतम परदेश जाकर अपनी प्रिया को भूल गया है। ये भी प्रियतमा के दुख का यह कारण है।

प्रश्न 2

कवि ‘नयन न तिरपित भेल’ के माध्यम से विरहिणी नायिका की किस मनोदशा को व्यक्त करना चाहता है?

उत्तर :

 


प्रश्न 3

नायिका के प्राण तृप्त न हो पाने के कारण अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर :

नायिका का अपने प्रियतम से गहन प्रेम है और वह अपने प्रियतम के प्रेम सागर में डूबती ही जा रही है। उसका प्रेम बेहद पुराना हो चुका है, लेकिन उसके प्रेम की तड़प बढ़ती ही जा रही है। वह अपने प्रियतम को जितना अधिक देखती है, उतनी ही उतना ही अधिक देखने के भाव उसके मन में जागते हैं और वह प्राप्त नहीं हो पाती।

उसके प्रेम में पुरानापन होने के बावजूद उस में निरंतर नवीनता का समावेश होता जा रहा है। इसी कारण उसे अपने प्रियतम प्रथम दिवस के मिलन जैसा ही आकर्षक दिखाई दे रहा है। अपने प्रेमी के साथ में हर पल, हर क्षण निकट रहना चाहती है। उसके प्रेमी का साथ उसके लिए खुद को दिलासा तो देता है, लेकिन उसके मन में तृप्ति का भाव मिट नहीं पाता। उसके प्राण अतृप्त ही रहते हैं, इसी कारण उसके प्राण अतृप्त कामना दिए हुए प्रेमी के आस पास ही रहना चाहते हैं, ताकि वह निरंतर अपने प्रियतम को देख सके और अपने मन को तृप्त कर सके।


प्रश्न 4

‘सेह फिरत अनुराग बखानिअ तिल-तिल नूतन होए’ से लेखक का क्या आशय है?

उत्तर :

सेह फिरत अनुराग बखानिअ तिल-तिल नूतन होए’ इन पंक्तियों का आशय प्रेम के बदलते स्वरूप को बताना है। कवि का कहना है कि प्रेम ऐसा भाव है, जो निरंतर परिवर्तित होता रहता है। इसके लिए इसके विषय में कुछ भी कहना संभव नहीं है। प्रेम स्थिर नहीं है, इसमें निरंतर परिवर्तन होता रहता है। वह हमेशा पुराना नहीं रहता। वह नित्य नवीन होता जाता है।

स्थिर वस्तु का वर्णन किया जा सकता है, परंतु प्रेम तो परिवर्तनशील है। वह पल-पल बदलता रहता है। इस कारण उसके बारे में बताना, उसका वर्णन करना बेहद कठिन हो जाता है। प्रेम में रत प्रेमी-प्रेमिका प्रेम से जितना बाहर निकलता चाहते हैं, वह उतना ही उसके अंदर डूबते जाते हैं। प्रेमियों के बीच प्रेम का आकर्षण प्रेम के परिवर्तनशील रूप के कारण निरंतर बढ़ता ही जाता है और प्रेम प्रगाढ़ होता रहता है। इसीलिए कवि ने प्रेम के बदलते स्वरूप के बारे में बताते हुए कहा है कि प्रेम के विषय में कुछ भी कह पाना कठिन है।


प्रश्न 5

कोयल और भौरों के कलरव का नायिका पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर :

कोयल और भंवरे के कलरव का नायिका पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ रहा है। कहने को तो कोयल का स्वर्ग बेहद मधुर होता है और भंवरे की गुंजन कानों को अच्छी लगती है, लेकिन कोयल और भंवरे के यह कलरव अब न्याय को और अधिक कष्ट प्रदान कर रहे हैं, क्योंकि कोयल का मधुर स्वर और भंवरे की गुंजन सुनकर नायिका को अपने प्रियतम की याद आ रही है, जोकि परदेश गया हुआ है। इस कारण नायिका की विरह रूपी अग्नि और अधिक भड़क जाती है, जिससे उसे अधिक कष्ट होने लगता है।

नायिका अपने कानों पर हाथ रख लेती है ताकि उसे कोयल का मधुर स्वर और भंवरे की गुंजन सुनाई ना दे, क्योंकि इन दोनों की यह स्वर उसे मधुरता की जगह कष्ट प्रदान कर रहे हैं और उसे उसके प्रियतम की याद दिला कर उसकी विरह अग्नि को भड़का रहे हैं।


प्रश्न 6

कातर दृष्टि से चारों तरफ़ प्रियतम को ढूँढ़ने की मनोदशा को कवि ने किन शब्दों में व्यक्त किया है?

उत्तर :

कातर दृष्टि से अपने प्रियतम को चारों ओर ढूढने की मनोदशा को कवि ने इन पंक्तियों के माध्यम से व्यक्त किया है…

कातर दिठि करि, चौदिस हेरि-हेरि
नयन गरए जल धारा।

इन पंक्तियों के माध्यम से कवि का आशय यह है कि जिस प्रकार कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी बेहद क्षीण होती जाती है, उसी तरह नायिका का शरीर भी अपने प्रियतम की याद में बेहद क्षीण यानी कमजोर होता जा रहा है।
अपने प्रियतम के वियोग में तड़प रही नायिका की आँखों से हर समय आँसू बहते रहते हैं। वो हर पल अपने प्रियतम की याद में रोती रहती है। इसी कारण वह हर जगह अपने प्रियतम को ढूंढती रहती है। उसकी कातर निगाहें जिधर देखो उधर अपने प्रियतम को ढूंढने का प्रयास करती हैं। उसे उम्मीद है कि शायद उसके प्रियतम की एक झलक उसे कहीं देखने को मिल जाए और वह अपनी मन को तृप्ति दे सके, उसके मन को शांति मिले।


प्रश्न 7

निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए– ‘तिरपित, छन, बिदगध, निहारल, पिरित, साओन, अपजस, छिन, तोहारा, कातिक

उत्तर :

दिए गए शब्दों के तत्सम रूप इस प्रकार होंगे :

तिरपित : संतुष्टि
छन : क्षण
बिदगध : विदग्ध
निहारल : निहारना
पिरित : प्रीति
साओन : सावन
अपजस : अपयश
तोहारा : तुम्हारा
कातिक : कार्तिक

तत्सम शब्द तत्सम शब्दों से तात्पर्य उन शब्दों से होता है, जो संस्कृत भाषा से ज्यों के त्यों अन्य भाषाओं में ग्रहण किए जाते हैं, जबकि तद्भव शब्द वे शब्द होते हैं, जो संस्कृत भाषा से तो ग्रहण किए जाते हैं, लेकिन जिस भाषा में वह ग्रहण किए जाते हैं, उस भाषा में उनका रूप बदल जाता है। ऊपर दिए गए शब्द तद्भव शब्द हैं, इसीलिए उनका तत्सम रूप पूछा गया है।


प्रश्न 8

निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए-

(क) एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए।
सखि अनकर दुख दारुन रे जग के पतिआए।

(ख) जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।।
सेहो मधुर बोल स्रवनहि सूनल स्रुति पथ परस न गेल।।

(ग) कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि, मूदि रहए दु नयान।
कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि सुनि, कर देइ झाँपइ कान।।

उत्तर :

निम्नलिखित का आशय स्पष्ट इस प्रकार होगा

(क) एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए।
सखि अनकर दुख दारुन रे जग के पतिआए।

आशय : इन पंक्तियों से कवि का आशय यह है कि वह यह स्पष्ट करना चाह रहा है कि नायिका का प्रेमी परदेश किसी कार्य के लिए गया है और नायिका अपने घर में अकेली है। पति के वियोग में तड़प रही नायिका हर पल दुखी रहती है। पति का वियोग उसे इतना परेशान कर रहा है कि वह सुकून से नहीं रह पा रही है। अपने दिल की परेशानी को वह अपनी सखी को बताती हुई कहती है कि उसके पति की अनुपस्थिति और वियोग उसे बहुत कष्ट प्रदान कर रहा है। क्या इस संसार में कोई ऐसा है, जो उसके दुखों को समझ पाए। नायिका के कहने का भाव यह है कि कोई भी व्यक्ति संसार में किसी दूसरे के दुख की गहराई को नहीं समझ सकता।

(ख) जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।।
सेहो मधुर बोल स्रवनहि सूनल स्रुति पथ परस न गेल।।

आशय : इस पंक्ति का आशय यह है कि कलि नायिका के मन की अतृप्त स्थिति का वर्णन कर रहा है। नायिका का मन अपने प्रेमी को बार-बार देखने के बाद भी नही भरता है। नायिका का प्रेम बहुत पुराना हो चुका है, लेकिन अपने प्रियतम के सुंदर मनोहारी रूप के दर्शन करके नायिका के मन को तृप्ति नहीं मिल पा रही। वह अपने प्रियतम को हर समय हर पल निहारते रहना चाहती है। उसका प्रियतम का मनोहारी रूप इतना सुंदर और पल-पल बदलने वाला है कि नायिका का मन बार-बार अपने प्रियतम को देखते रहने को करता है, फिर भी उसके नेत्र अतृप्त रह जाते हैं। नायिका के अपने प्रियतम के स्वर भी नायिका लंबे समय से सुनती आ रही है लेकिन फिर भी उसके स्वर उसे नये प्रतीत होते हैं।
नायिका के कहने का भाव यह है कि भले ही उसका प्रेम कितना भी अधिक पुराना हो गया हो, लेकिन उसमें नित्य नवीनता का समावेश होता जा रहा है। इसी नवीनता के कारण वह पूरी तरह  तृप्त नहीं हो पा रही। उसे बार-बार अपने प्रियतम के देखते रहने और उससे बातें करने का मन करता है।

(ग) कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि, मूदि रहए दु नयान।
कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि सुनि, कर देइ झाँपइ कान।।
आशय :  इस पंक्ति के माध्यम से कवि ने नायिका के ह्रदय की मनोदशा का चित्रण किया है। चूँकि नायिका विययोग की अवस्था में है इसलिए उसे प्रकृति का मनमोहक वातावरण भी भा नहीं रहा है। आसपास का प्राकृतिक वातावरण भी उसे सुहाना नहीं लग रहा है बल्कि वह संयोग कालीन होकर भी उसे कष्ट प्रदान कर रहा है।
उसका प्रियतम उसे छोड़कर परदेश गया हुआ है। नायिका प्रियतम के वियोग की विरह रूपी अग्नि में जल रही है। वसंत ऋतु के कारण आसपास का वातावरण मनमोहक हो गया है। लेकिन कोयल के स्वर कूक रहे हैं। भंवरे की गुंजन सुनाई दे रही है लेकिन यह सभी बातें ही नायिका को अच्छी नहीं लग रहीं। सब को सुनकर देख सुनकर नायिका को अपने प्रियतम की याद सता रही है और उसकी विरह रूपी अग्नि और अधिक भड़क जाती है। इसी कारण वह अपने कानों को बंद कर देती है ताकि इन सबको सुनरक उसे अपने प्रियतम की याद नहीं आए।


(योग्यता विस्तार)

प्रश्न 1

पठित पाठ के आधार पर विद्यापति के काव्य में प्रयुक्त भाषा की पाँच विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए।

उत्तर :

पठित पाठ के आधार पर विद्यापति के काव्य की पांच विशेषताएं इस प्रकार हैं…

विद्यापति ने अपने काव्य में अलंकारों का अति सुंदर रूप से प्रयोग किया है।
जैसे, तोहर बिरह दिन छन-छन तुन छिन-चौदसि-चाँद समान।

इस पंक्ति में उन्होंने ‘छन-छन’ के माध्यम से ‘विप्सा अलंकार’ का प्रयोग किया है, तो ‘चाँद समान’ में ‘उपमा अलंकार’ तथा ‘चौदसि चाँद’ में अनुप्रास अलंकार की छटा बिखेरी है। ‘वियोग श्रृंगार अलंकार’ का भी अपने पूरे काव्य में विद्यापति ने सुंदर दम प्रयोग किया है।
विद्यापति ने अपने काव्य में तद्भव शब्दों का भी सुंदरता प्रयोग किया है, जैसे निहारत, साओन, तोहारा, तिरुपित इत्यादि।
विद्यापति के काव्य की भाषा मैथिली है, जो मिथिलांचल की लोकप्रिय भाषा है।
उनकी भाषा में लौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति प्रकट होती है।

प्रश्न 2

विद्यापति के गीतों का आडियो रिकार्ड बाजार में उपलब्ध है उसको सुनिये।

उत्तर :

ये एक प्रायोगिक गतिविधि है। विद्यार्थी बाजार में उपलब्ध विद्यापति आडियो रिकार्ड लाकर सुनें।

प्रश्न 3

विद्यापति और जायसी प्रेम के कवि हैं। दोनों की तुलना कीजिए।

उत्तर :

जी हाँ, विद्यापति और जायसी दोनों प्रेम के कवि हैं। दोनों की रचनाओं में प्रेम की बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति की गई है। दोनों की रचनाओं में बेहद समानता दिखाई देती है। दोनों ने अपनी काव्य  में वियोग श्रृंगार रस का सबसे अधिक प्रयोग किया है, और नायक का नायक नायिका वियोग को ही अपनी रचनाओं का आधार बनाया है। दोनों कवियों ने विरह में तड़प रहे नायक-नायिका वियोग का मार्मिक चित्रण किया है। दोनों कवियों की काव्य की नायिका अपने प्रियतम से मिलन के लिए आतुर है, और अपने प्रियतम की अनुपस्थिति और वियोग उसे असीम दुख प्रदान कर रहा है।

दोनों के काव्य में थोड़ी से भिन्नता यह है कि जहाँ मलिक मुहम्मद जायसी ने अलौकिक प्रेम को प्रमुखता दी है वही विद्यापति ने लौकिक प्रेम को प्रमुखता दी है। जहाँ जायसी लोककथा को अपनी प्रेम की अभिव्यक्ति का आधार बनाया है, वहीं विद्यापति ने श्रीकृष्ण राधा के प्रेम को अपनी अभिव्यक्ति का आधार बनाया है।


पद : विद्यापति (कक्षा-12 पाठ-9 हिंदी अंतरा भाग 2)

PAD : VIDYAPATI (Class-12 Chapter-9 Hindi Antra 2)


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