Sunday, March 3, 2024

बसंत पंचमी को जानें। क्यों मनाते हैं? कैसे मनाते हैं? बसंत पंचमी का अर्थ और महत्व।

वसंत पंचमी (Basant Panchami) का त्यौहार वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक त्यौहार है, जो वसंत ऋतु के आगमन के साथ-साथ विद्या की देवी सरस्वती की आराधना के लिए भी प्रसिद्ध है। बसंत पंचमी का त्यौहार क्यों मनाते हैं? इसे कैसे मनाते हैं? इस दिन क्या किया जाता है। इसके बारे में पूरी तरह जानते हैं…

बसंत पंचमी (Basant Panchami)

बसंत पंचमी बसंत ऋतु का एक प्रमुख त्यौहार है, जो हिंदुओं का एक प्रसिद्ध त्यौहार है। यह त्योहार विद्या की देवी सरस्वती के लिए समर्पित त्यौहार है, क्योंकि इस दिन देवी सरस्वती की पूजा आराधना की जाती है।

देवी सरस्वती विद्या और ज्ञान की देवी हैं, इसलिए जो विद्या के उपासक हैं, जो छात्र हैं, जो शिष्य हैं, जो विद्वान हैं वह सब बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती की पूजा आराधना करते हैं।

वसंत ऋतु में आने के कारण यह त्यौहार ऋतुओं से भी जुड़ गया है, क्योंकि बसंत ऋतु का आगमन बसंत पंचमी के दिन से ही माना जाता है। इस दिन से वसंत ऋतु का आगमन होता है और चारों तरफ मदमस्त वातावरण छा जाता है। प्रकृति में चारों तरफ पीले-पीले पुष्प खिल उठते हैं। सरसों के पीले-पीले खेत फसल से लहलहा उठाते हैं।

स्त्री-पुरुष पीले वस्त्र पर पहनकर बसंत पंचमी के दिन हर्षोल्लास से बसंत ऋतु का स्वागत करते हैं। जो विद्यार्थी हैं, जो विद्वानजन हैं, विद्या के उपासक है, वह इस दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की पूजा आराधना करते हैं और उनसे अपने जीवन में विद्या और बुद्धि देने की प्रार्थना करते हैं।

बसंत पंचमी कब मनाई जाती है?

बसंत पंचमी हर वर्ष माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह पर्व जनवरी अथवा फरवरी महीने में पड़ता है। सामान्यतः फरवरी के प्रथम अथवा द्वितीय सप्ताह में यह पर्व पड़ता है।

माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि से ही वसंत ऋतु का आगमन होता है और इसी दिन वसंत पंचमी का त्यौहार मनाया जाता है।

वसंत पंचमी का त्यौहार मनाने के पीछे क्या कारण है?

बसंत ऋतु में प्रकृति में जितनी अधिक सुंदरता और होती है और प्रकृति जितनी अधिक सुहानी होती है, उतनी अन्य किसी ऋतु में नहीं होती। बसंत ऋतु में चारों तरफ मदमस्त वातावरण छा जाता है, क्योंकि इसी दिन से बसंत ऋतु का आगमन होता है। इसीलिए वसंत ऋतु के आगमन के दिन को वसंत पंचमी के त्यौहार के रूप में मनाया जाने लगा। वसंत ऋतु का त्योहार हर्षोल्लास के आगमन का प्रतीक है और इस दिन का लोग ऋतुओं की रानी बसंत ऋतु के स्वागत करने लगे हेतु बसंत पंचमी का त्योहार मनाने लगे।

ऋग्वेद में यह वर्णन मिलता है कि देवी सरस्वती जिसकी जीभ पर बैठ जाती हैं, उसकी जीभ पर सरस्वती का वास माना जाता है और वह अत्यंत विद्वान व कुशाग्र विधि का व्यक्ति होता है। जो लोग विद्या को महत्व देते हैं, विद्वान बनना चाहते हैं, जो पुस्तकों को बहुत अधिक पढ़ते हैं, जिनका संबंध लेखन, पठन और साहित्य कार्य से रहता है, वह देवी सरस्वती को अपना इष्ट मानकर उनकी पूजा आराधना करते हैं।

बहुत से विद्यालय में जोकि भारतीय संस्कृति के लिए समर्पित हैं, वहाँ पर भी विद्यार्थियों को देवी सरस्वती की पूजा आराधना करने की जाती है और सरस्वती वंदना गाई जाती है।

बसंत पंचमी मनाने के पीछे पौराणिक मान्यताएं?

बसंत पंचमी का त्यौहार मनाने के पीछे अनेक पौराणिक मान्यताएं भी छुपी हैं। यह त्यौहार पूरी तरह विद्या की देवी सरस्वती के लिए समर्पित कर दिया गया है। भारत के अनेक धार्मिक ग्रंथो में विद्या की देवी सरस्वती और बसंत पंचमी के त्यौहार का वर्णन मिलता है।

यह त्यौहार देवी सरस्वती के जन्मदिन के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। माना जाता है विद्या की देवी सरस्वती का प्रकटीकरण बसंत पंचमी के दिन ही हुआ था। बसंत पंचमी के दिन को उनके आविर्भाव का दिन माना जाता है। उनका आभिर्भाव होने के कारण इस दिन को वागेश्वरी जयंती अथवा श्री पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। वागेश्वरी देवी सरस्वती का ही एक नाम है।

वसंत पंचमी को मनाने के पीछे पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार जब ब्रह्मा जी ने अपनी किसी समस्या के निवारण के लिए अपने कमंडल से जल लेकर अपनी हथेली पर रखा और संकल्प लिया, फिर उसे जल को छिड़ककर उन्होंने भगवान विष्णु की आराधना करना आरंभ की तो भगवान विष्णु तत्काल ही उनके सामने प्रकट हुए।

भगवान ब्रह्मा ने भगवान विष्णु को अपनी समस्या बताई। तब भगवान विष्णु ने आदिशक्ति दुर्गा माता का आह्वान किया उनके आह्वान पर भगवती दुर्गा तुरंत प्रकट हुई। तब दोनों देवों में देवी दुर्गा से समस्या के निवारण का निवेदन किया। उनकी समस्या को जानकर आदिशक्ति दुर्गा ने शरीर से श्वेत रंग का एक तेज उत्पन्न हुआ तो वह एक तेज दिव्य नारी के रूप में परिवर्तित हो गया।

उन दिव्य नारी का स्वरूप चतुर्भुजधारी था। उनके चारों हाथों में से एक हाथ में वीणा थी तो दूसरे हाथ में पुस्तक थी। एक हाथ में माला थी तथा चौथा हाथ से उन्होंने वर मुद्रा धारण की हुई थी। जैसे ही वह दिव्य स्वरुप वाली देवी प्रकट हुईं तो प्रकट होते ही उन्होंने अपनी वीणा से मधुर नाद किया, जिससे सृष्टि के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई। पूरे सृष्टि में वाणी की हलचल होने लगी और कोलाहल होने लगा। सृष्टि में शब्द और रस का संचार करने वाली उन देवी को सरस्वती कहा गया।

उनका प्रकटीकरण वसंत पंचमी यानी मार्ग शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के दिन ही हुआ था, इसीलिए बसंत पंचमी को माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी को देवी सरस्वती के अभिर्भाव दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

बसंत पंचमी का त्यौहार का महत्व

बसंत पंचमी का त्यौहार का पर्व का दिन बेहद शुभ माना गया है। यह सभी शुभ कार्यों के लिए बेहद सर्वश्रेष्ठ दिन है। इस दिन कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है। बसंत पंचमी का पूरा दिन ही शुभ मुहूर्त माना गया है। यह माघ मास में आता है और माघ मास धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व वाला मानस माना गया है। इसीलिए बसंत पंचमी का त्यौहार भी बेहद शुभ और महत्वपूर्ण त्यौहार है।

बसंत पंचमी का त्यौहार कैसे मनाते हैं?

बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती की आराधना की जाती है, इसलिए जो देवी सरस्वती के उपासक हैं, वह इस दिन व्रत धारण करते हैं और देवी के वीणाधारी स्वरूप की मूर्ति अथवा चित्र को अपने घर अथवा संस्थान में बने मंदिर में स्थापित करके उनकी विधि विधान से पूजा करते हैं।

इसी दिन विद्या के उपासक को पूरे दिन व्रत धारण करना चाहिए और स्वयं अथवा किसी ब्राह्मण के द्वारा स्वास्ति वचन करना चाहिए। उसके बाद विधि विधान से गंध, अक्षत, फल, फूल, धूप, दीप नैवेद्य आदि के द्वारा पूजा करनी चाहिए।

देवी सरस्वती के मंत्र की कम से कम एक माला जपनी चाहिए और देवी सरस्वती के स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। पूरे दिन मौन रहकर व्रत धारण करना चाहिए और संध्या के समय ही भोजन करना चाहिए। यदि व्रत नहीं धारण कर रहे हो तो भी विधि विधान से पूजा पाठ करने के बाद ही सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए।

देवी सरस्वती को  सफेद पदार्थ का भोग अर्पण करना चाहिए अर्थात उन्हें चावल, दूध से बने पदार्थ का भोग लगाना चाहिए। देवी सरस्वती की विधि-विधान से पूजा पाठ करने पर उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है और वह व्यक्ति विद्या के क्षेत्र में अवश्य विद्वान बनता है।

वसंत पंचमी का ऋतु की दृष्टि से महत्व

बसंत पंचमी का त्योहार वसंत ऋतु के आगमन का भी प्रतीक त्यौहार है। उत्तर भारत में यह त्यौहार विशेष रूप से प्रसिद्ध है, क्योंकि यहाँ पर इस दिन बसंत की बहार चारों तरफ छाई रहती है। सरसों के पीले पीले खेत लहलहा रहे होते हैं। पीले रंग को हिंदू धर्म में शुभ रंग भी माना गया है। इस दिन सभी लोग पीले वस्त्र धारण कर नृत्य और गान करते हैं और हर्षोल्लास से त्यौहार मनाते हैं। वह अपने घर में तिल से मिठाइयां बनाते हैं। केसर युक्त खीर बनाते हैं, पीले लड्डू बनाते हैं और खाते हं।

वसंत पंचमी संबधी कुछ विशेष तथ्य

  • बसंत पंचमी के दिन से ही वसंत ऋतु का आगमन होता है।
  • वसंत पंचमी के दिन ही भगवान प्रभु श्री राम माता शबरी के आश्रम में गए थे।
  • वसंत पंचमी के दिन ही भगवान शिव ने कामदेव को अपने तीसरे नेत्र से भस्म किया था और उसके बाद कामदेव ने श्री कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लिया था, इसलिए इस दिन कामदेव की भी पूजा की जाती है।
  • वसंत ऋतु के दिन ही राजा भोज का जन्मदिन भी आता है, राजा भोज प्राचीन भारत में परमार वंश के एक प्रसिद्ध राजा थे जो मध्य भारत में मालवा क्षेत्र के आसपास आसपास केंद्रित था।
  • हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्मदिन भी बसंत पंचमी के दिन ही आता है।

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